वनचरों पर अनुकाव्य...
9. वनराज MOUNTAIN LION BY-D.H.LAWRENCE
सर्दियों और जनवरी की बरसती बर्फ में
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सर्दियों और जनवरी की बरसती बर्फ में
बहते पानी के गहरे दर्रे स्याह
घने सनोवर के वृक्ष,नीली गुलमेहंदी
तरल जल की कल-कल,छल-छल
और दूर तक पसरा नागरमोथे का जाल
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वहाँ है इंसान... दो इंसान
इंसान-दुनिया का सबसे भयावह प्राणी!
वे झिझकते हैं बन्दूक रखकर भी
पर, हमारे पास तो कुछ भी नहीं!
सबके कदम बढ़ते हैं आगे की ओर
निकलते हैं दो मेक्सिकी अजनबी
घनघोर घनी घाटी से बाहर
अँधेरा... बर्फ और एकाकीपन
गुम होती पगडंडियों पर
क्या कर रहे हैं वे दोनों ?
*****
कांधे पर लदी पीली सी गठरी
आखिर क्या है-हिरण!
मूर्खतापूर्ण हंसी से झेंपते हैं वे
जैसे पकड़ी गई हो कोई गलती
और हम भी मुस्कुराते है ,उसी तरह
मानो अन्जान हों उस दुखान्तिका से
क्या सभ्य है वह गहरे चेहरे का इंसान!
और बेबस है हम-वनराज!
*****
ओह वनराज .....!
पीतवर्णी पर निर्जीव,प्राणहीन
तिरस्कार भरी हंसी से बोला वह
मारा है मैंने इसे आज सुबह
गोल, सुन्दर माथा ,निष्प्राण कर्ण
काली दमकती धारियां
सर्द चेहरा और आँखें बेजान
इंसान-अधिकारी है खुलेपन का
और हम सिमटे घाटी के धुंधलके में
*****
यहाँ ऊपर किसी वृक्ष की शाख पर
मिलते हैं कुछ केश गुच्छ
भर आता है मन,आँखें होती है नम
गहरा सूराख है नारंगी चट्टान की छाती पर
बिखरी हड्डियाँ,शाखें और फैलती गंध
अब उस राह नहीं जायेंगे कभी वे लोग
क्योंकि यहाँ नहीं गरजेगा वनराज
न होगा कुहासे सा चेहरा और...
न होगी उसकी निहार ,चमकीली धारियां
नारंगी चट्टानों से बनी घाटी के पेड़ों से
निकालकर अपना चेहरा मुहाने पर
नहीं होगा वह वनराज
*****
पर मैं देखता हूं दूर..दूर..और दूर
रेगिस्तान के क्षितिज का वह धुंधलका
एक स्वप्नमयी मृगमरीचिका
बर्फ जमी पहाड़ी पर ,हरे स्थितिप्रग्य
क्रिसमस वृक्ष की तरह खड़ा मैं
सोचता हूँ की इस एकाकी दुनिया में
जगह थी मेरे और वनराज के लिए भी
*****
पर... उस पार की दुनिया में
कितनी आसानी से बसने देते हैं हम
इंसानों की अनगिनत बस्तियां अनथक
फिर भी कितना अंतर है इन दोनों दुनियाओं में
इंसानों को हम नहीं खोते कभी पर
वनराज को क्यों खो देता है इंसान!
10. विरही परिंदा TO THE WIDOW BIRD BY-P.B. SHAILY
बिछड़ी माशूका के गम में मायूस था
विरह से व्यथित एक विरही परिंदा
बैठा था कांपती डाल के कोने पर
गुमसुम.. यादों के हसीं हिंडोले पर
सीना चीर रही थी ऊपर हवाएं सर्द
नीचे बहता झरना भी हो गया था बर्फ
बेरौनक थे बेपत्ता जंगलों के नंगे ठूंठ
जमीन पर भी नहीं गिरा था एक भी फूल
खामोश थी हवाएं ... एकदम बेजान
गाहे-ब-गाहे चीखती थी पवनचक्की नादान
11. EAGLE - BY--A. L. TENINSON
खुरदरी चट्टान को अपने क्रूर पंजों में थाम
वीरान भूमि पर ,तप्त सूरज के आयाम
नीलाभ विश्व के वर्तुल,फिर भी नहीं आराम
झुर्रियां भरा समुद्र रेंगता है नीचे
तीक्ष्ण दृष्टि है उसकी,शिकर के पीछे
तब झपट्टा है वह बिजली बनकर नीचे
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