विज्ञान युग का सच्चा ईश्वर!


विज्ञान युग का सच्चा ईश्वर!
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 अगर आप , या आपके घर का
कोई भी छोटा या बड़ा सदस्य
आंशिक  या  पूरी तरह से
हो जाये /गया हो लकवाग्रस्त
अगर आप .... करते हैं  संवाद
स्पीच डिवाइस प्रणाली से
अगर जवाब दे दिया है
शरीर की अनेक इन्द्रियों ने
फिर भी सक्रिय  है आपकी
मेधा  और जीवन की चाह
चाहे शरीर हो गलित- गात्र
अगर समझ लिया हो आपको
पत्नी या परिजनों ने (अफ़सोस!)
अनकहे -अपने जीवन का  बोझ
तब इस विज्ञान युग में
अगर घर में हो देवालय
 वहां निहायत  जरूरी है चित्र
सिर्फ स्टीफन हॉकिंग का
इसलिए क्योकि वही है
विज्ञान युग का सच्चा -ईश्वर !
( हालांकि विज्ञान युग के ईश्वरों की फेहरिस्त काफी लम्बी है !)






मान्यवर,
सादर नमस्कार 
समाचार संलग्न है। इस समाचार का प्रकाशन कर रचना धर्मिता का सम्मान करें -किशोर दिवसे 



किशोर  दिवसे अनूदित पुस्तकों की डबल हैट्रिक
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बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। वरिष्ठ पत्रकार एवं अनुवादक किशोर दिवसे अनूदित तीन पुस्तकें फरवरी माह में प्रकाशित हुई हैं। वर्ष 2008 के फरवरी माह में भी श्री दिवसे द्वारा अनूदित तीन पुस्तकों की हैट्रिक प्रकाशित हुई थी जिसका विमोचन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने किया था। वर्ष 2014 में छपी  पुस्तकों का प्रथम पुष्प है "माँ   "  . दलित विमर्श के तहत महाराष्ट्र के प्रख्यात पत्रकार एवं साहित्यकार उत्तम कांबले की  मूल मराठी पुस्तक  " आई" का यह अनुवाद है। मराठी में इसके 28 संस्करण  छप  चुके हैं। कन्नड़, उर्दू व अंग्रेजी अनुवाद के अलावा इस पर नेत्रहीनों के लिए " टाकिंग बुक ' भी ब्रेल लिपि में बन चुकी  है। 
                             दूसरी पुस्तक के लेखक हैं आ.ह.सालुंखे। स्त्री विमर्श पर मूल मराठी में लिखी गई पुस्तक "हिन्दू संस्कृति आणि स्त्री" का यह अविकल अनुवाद " हिन्दू संस्कृति और स्त्री " के नाम से प्रकाशित हुआ है। मराठी संस्करण को वर्ष 1990 में महाराष्ट्र सरकार  का  डॉ। बाबा साहेब आम्बेडकर पुरस्कार मिला था। 
                          तीसरा अनुवाद है दिल्ली विश्व विद्यालय के सत्यवती  कालेज में राजनीति शास्त्र की रीडर डॉ अजीत जावेद रचित मूल अंग्रेजी पुस्तक " " हेरिटेज आफ हार्मोनी " का। मध्य युगीन भारत में हिन्दू- मुस्लिम धर्मानुयायियों के जीवन अंतर सम्बन्धों पर यह गहन अंतर दृष्टि डालता है। वर्ष 2008 में किशोर दिवसे के प्रकाशित तीन अनुवाद  थे -1. विज्ञान उदय और  विकास-मूल लेखक- प्र. ना.जोशी ( मराठी), देवदासी- मूल लेखक-उत्तम  कांबले ( मराठी)तथा 3. महान विप्लव- मूल अंग्रेजी लेखक -क्रिस्टोफर हिबर्ट  की  पुस्तक द ग्रेट म्युटिनी इण्डिया ; 1857 का हिंदी शीर्षक- महान विप्लव ;1857 के नाम  से हिंदी अनुवाद। सभी छह पुस्तकों के प्रकाशक हैं आलोक श्रीवास्तव संवाद प्रकाशन,आई-499 मेरठ -पिन-250004 ,उत्तरप्रदेश।  प्रकाशक से मोबाइल  न.09610584000  या मेल आई-डी aloks.shrivastav@gmail .com  पर संपर्क किया जा सकता है। 
                                                                                                                   


                                                                                                                                                     किशोर दिवसे 
संपर्क - किशोर दिवसे 
फ़्लैट न.  308 ,ऑम गार्डेंस ,पारिजात कालोनी 
बिलासपुर -495001 ,छत्तीसगढ 
                                                                                                                                                    -09827471743 
                                                                                                                                                   मेल  आई डी -kishorediwase0@gmail.com


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                                                                                                                     किशोर दिवसे            बिलासपुर, छत्तीसगढ़    
                                                                                                                     मोबाइल- 09827471743  

                             
अनुभव तथा ज्ञान की अपडेटिंग जीवन के किसी भी क्षेत्र में परिपक्वता के लिए अनिवार्य है.वर्ष 1979 से आज तक यानी तीन दशक से अधिक अरसा हुए मैंने पत्रकारिता व लेखन   के क्षेत्र में अनथक यात्रा जारी रखी ... प्रतिपल सीखता रहा.लिहाजा मेरे कार्य क्षेत्र से जुड़ा  तब और अब का पारदर्शी प्रतिबिम्ब  कम्प्यूटर युग के सन्दर्भ में स्पष्ट झलकता है.
            छत्तीसगढ़ व् महाराष्ट्र से मेरी शिक्षा हुई.रायपुर से बी. जर्नलिज्म  तथा पूर्व में नागपुर महाराष्ट्र से बी.एससी किया. अंग्रेजी, हिंदी, मराठी का  धाराप्रवाह  ज्ञान मेरे लेखन की धुरी है.अत; अनुवाद, स्तम्भ लेखन.कथा-कहानी रचना,मेरे प्रिय विषय रहे है.
               पत्रकारिता का सफ़र
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  1.  युगधर्म रायपुर,छत्तीसगढ़(1979 -1982)  २.नवभारत,रायपुर(1982-1984 ) .३. नवभारत बिलासपुर  (1984 -  आज तक ) सम्प्रति -नवभारत बिलासपुर में संस्थापक सह संपादक.तथा पृथक रूप से परियोजना निर्माण. 
          जहाँ से मिला अनुभव 
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1. विभिन्न मुद्दों पर रिपोर्ताज, रेडियो वार्ताए.2. एक्शन एड फेलोशिप के तहत स्वास्थ्य  अधोसंरचना पर 5 लेख प्रकाशित (एक अंग्रेजी).3.छत्तीसगढ़ में IFAD परियोजना कार्यक्रम के दस्तावेजों के मूल प्रारूप का अनुवाद .4.ग्रामीण रिपोर्ताज,कथा-लेखन,विभिन्न विषयों पर पुस्तकों का  प्रोफेशनल ट्रांसलेशन 5. गुरू  घासीदास विवि के पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग लेक्चरार रहा.

              पुस्तकें प्रकाशित
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1. विज्ञान का इतिहास- पी.एन.जोशी विज्ञानं उद्भव आणि विकास  ( मराठी- हिंदी).2.महान विप्लव-क्रिस्टोफर हिब्बर्ट- इन्डियन म्यूटिनी-1857 ( अंग्रेजी-हिंदी).3.देवदासी- उत्तम काम्बले -मराठी-हिंदी)
4. माँ -उत्तम कांबले ( मराठी-हिंदी),5 हिन्दू संस्कृति और स्त्री-आ. ह.  सालुंखे   हिन्दू संस्कृति आणि स्त्री ,( मराठी- हिंदी).6 .साझा  विरासत--डॉ. अजीत जावेद ( मूल अंग्रेजी- हेरिटेज आफ हार्मोनी) सभी अनुवाद- प्रकाशक- आलोक श्रीवास्तव, संवाद प्रकाशन  I-499 शास्त्री नगर , मेरठ.( MOBILE- 09610584000)

                       शीघ्र प्रकाश्य
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1 .चीन की लोक कथाएं -(अंग्रेजी से हिंदी)  ,साहित्य अकादेमी दिल्ली .  2.  कौवे और इन्सान -उत्तम कांबले  ,( मराठी- हिंदी ). कावळे  आणि माणस , आधार प्रकाशन हरियाणा ,3 . कथा लोक-छत्तीसगढ़ -यश प्रकाशन दिल्ली )

          संपर्क
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ई-मेल-  
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निवास 
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किशोर दिवसे ,फ़्लैट- न.-308  ऑम गार्डन्स,पारिजात कालोनी ,कस्तूरबा नगर  बिलासपुर-495001,छत्तीसगढ़ 


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सबसे खूबसूरत दिल वही जो बाँटता है प्यार... | Kishore Diwase

सबसे खूबसूरत दिल वही जो बाँटता है प्यार... | Kishore Diwase

सबसे खूबसूरत दिल वही जो बाँटता है प्यार... | Kishore Diwase


राबर्ट बिनयन की एक(अनूदित ) कविता 




भूख हूँ मैं...
=========
भीड़ से छिटककर आता हूँ मैं
किसी परछाई की तरह /और
बैठ जाता हूँ हर इंसान की बाजू में
कोई भी नहीं देखता मुझे/पर
सभी देखते हैं एक-दूसरे का चेहरा
वे जानते हैं की मैं वहां पर हूँ
मेरा मौन है किसी लहर की ख़ामोशी
जो लील लेता है बच्चों का खेल मैदान
धीमी रात्रि में गहराते कुहासे की तरह 
आक्रान्ता सेनाएं रौंदती,मचाती हैं तबाही
धरती और आसमान में गरजती बंदूकों से
लेकिन मैं उन फौजों से भी दुर्दांत
गोले बरसाती तोपों से भी प्राणान्तक
राजा और शासनाध्यक्ष देते हैं आदेश
पर मैं किसी को नहीं देता हुक्म 
सुनाता हूँ मैं राजाओं से अधिक
और भावपूर्ण वक्ताओं से भी 
निः  शपथ करता हूँ शब्दों  को
सारे उसूल हो जाते हैं असरहीन
नग्न सत्य अवगत हैं मुझसे
जीवितों को महसूस होने वाला
प्रथम और अंतिम शाश्वत हूँ मैं
भूख हूँ मैं... भूख हूँ मैं!




   

राबर्ट बिनयन की एक(अनूदित ) कविता







भूख हूँ मैं...
=========
भीड़ से छिटककर आता हूँ मैं
किसी परछाई की तरह /और
बैठ जाता हूँ हर इंसान की बाजू में
कोई भी नहीं देखता मुझे/पर
सभी देखते हैं एक-दूसरे का चेहरा
वे जानते हैं की मैं वहां पर हूँ
मेरा मौन है किसी लहर की ख़ामोशी
जो लील लेता है बच्चों का खेल मैदान
धीमी रात्रि में गहराते कुहासे की तरह 
आक्रान्ता सेनाएं रौंदती,मचाती हैं तबाही
धरती और आसमान में गरजती बंदूकों से
लेकिन मैं उन फौजों से भी दुर्दांत
गोले बरसाती तोपों से भी प्राणान्तक
राजा और शासनाध्यक्ष देते हैं आदेश
पर मैं किसी को नहीं देता हुक्म 
सुनाता हूँ मैं राजाओं से अधिक
और भावपूर्ण वक्ताओं से भी 
निः  शपथ करता हूँ शब्दों  को
सारे उसूल हो जाते हैं असरहीन
नग्न सत्य अवगत हैं मुझसे
जीवितों को महसूस होने वाला
प्रथम और अंतिम शाश्वत हूँ मैं
भूख हूँ मैं... भूख हूँ मैं!


अध्येता यायावर (SCHOLAR GYPSY- By-MATHEW ARNOLD)


जाओ गडरिये...वे पहाड़ी से तुम्हें बुला रहे हैं...
खोल दो वे जंगले जो टहनियों से बने हैं
लालायित भेड़ों के झुण्ड को भूखा  मत रहने दो 
और मत चीखने दो प्यास से साथी  कुत्तों को
कुतरी घांस के ठूंठों  का मत लगने दो मेला
जब खेत हों खामोश और हो गोधूलि की बेला
........
मजदूर और कुत्ते सब थककर हो गए हों चूर
सिर्फ सफ़ेद भेड़ें नजर आ जाएँ कहीं दूर
चाँद की दूधिया रोशनी में नहाये खेतों के पास
आओ गडरिये...ताजा कर ले किसी के मिलने की आस
.........
कटैया बहता है अपना पसीना  देर तक यहाँ 
छायादार इन खेतों के झुरमुटों में वहां
जहाँ रखा था उसने अपना गमछा,पोटली और सुराही
उगते सूरज के संग बाँधता है फसलों के ढेर
तब थकान से चूर भरता है अपना पेट दोपहर
यहाँ बैठ करूंगा मैं उसकी प्रतीक्षा उस पहर
दूर मैदान से गूंजेगी मेरे कानों में
मिमियाहट.... भेड़ के नन्हे छौने की 
भुट्टों के खेतों में काम करते कटैयों की 
और बेजान सी सरसराहट दुपहरी की 
..........
ऊंचे अधकटे   खेतों का यह छायादार कोना
ओ गडरिये!मैं रहूँगा यहाँ तब  तक 
जब तक आसमान में पसरेगा ,सूर्यास्त का सोना
सर उठाते हैं अहिपुष्प भुट्टे के घने खेतों में 
गोल गहरी जड़ें और सुनहरे मक्के की बालें 
मैं निर्निमेष निहारता हूँ अपलक किस तन्मयता में!
..................
किसलय उभरते हैं हरिणपदी की गुलाबी गोद से
महकती है मंदानिल नीम्बुओं  की गंध से
पुष्पित हैं पारिजात पावसी सम्मोहन से
और रक्षित हैं मन मयूर आदित्य  तप्त ताप से 
दृष्टि यात्रा पसरती है आक्सफोर्ड की अट्टालिकाओं पर
विस्मृत होता है चंचल मन देहभान त्यागकर
.......
देखो!तृणशैया पर रखा है "ग्लानविल का रचना संसार"
पन्नों के पार्श्व पर अंकित अध्येता यायावर का कथा सार
प्रखर मस्तिष्क.. पर गरीबी से थक हारकर'
टूट गया मानव तन विपदा से जूझकर
...
अब सुनो कहानी एक अध्येता यायावर की
गर्मियों की एक सुबह उसने छोड़ी सोहबत दोस्तों की
चला गया यायावरों से सीखने बातें अबूझ तिलस्म की
 चप्पा-चप्पा भटकता रहा दुनिया यायावरों की
जैसे बूझता हो पहेलियाँ,कंजर ... उत्पति गिरोह्जन की 
पर कभी सुध न ली अपने दोस्तों और आक्सफोर्ड की
..........
कई बरसों बाद बन गया एक  संयोग था
अचानक मिले दो साथी जिसे वह जानता था 
दोस्त! कैसे बीत रही है जिंदगी पूछा  उन्होंने
सबको हैरत में दाल दिया अध्येता यायावर की बातों ने
यायावर टोली जानती है तंत्र- मन्त्र -सम्मोहन!
वशीकरण से वश में कर लेना दूसरों का मन
विवश कर देता है इनकी मोहिनी का मोहपाश
जादुई विद्या के जोर पर करते है सर्वनाश...
और मैं.. बोलता रहा वह अध्येता यायावर 
भौचक थे किस्सों से .. अवाक सारे श्रोता थे 
उनकी कला का तिलस्म सीखकर आऊँगा मैं
कैसा है यह जादू दिखलाऊँगा मैं
पर पारंगत होने इस गूढ़ विद्या में 
ईश्वरीय वरदान की चाह  में प्रतीक्षारत हूँ मैं
......
बस इतना कहकर चल पड़ा  वह अध्येता यायावर
पर बात फैली सब और लपटों की तरह सर -सर 
गावों में अरसे से गुम अध्येता यायावर दिखा था आज
कुछ देर बोला पर चिंतित सा .. क्या था इसका राज!
यायावर की तरह  ही बन गया था अध्येता यायावर
वेश था उनके जैसा वैसा ही था उसका परिवेश
चोगा और अजूब टोपी,बस यही रह गया था शेष 
घूमता रहा था अध्येता यायावर कई गाँव कई देश
.



...................
वसंत की एक भोर ... मिला वह दरख्तों के नीचे
जलते अलावों के पास था वह यायावरों के पीछे 
असभ्य किन्तु अनुरागी,अनाडी लोगों के पास 
जैसे ही वे चीखते चिल्लाते और मचाते शोर
अध्येता यायावर यक्ष- प्रश्न लेकर निकलता किसी और
जीवंत  अंदाज उसका ऐसा खूब समझता था मैं
क्योकि लगता था की अगर वहां पर होता मैं
तो सरपट भाग निकलता कहाँ-कहाँ पर मैं
.........
पूछता था सभी से अपना चेहरा दिखाकर
बोलो देखा है ऐसे चेहरे वाले को तुमने कहीं पर!
पूछता था मैं खेतों पर बैठे रखवालों को
बोलो!वीराने रास्तों से गुजरते देखा है किसी को?
...
क्या अब मैं लेट जाऊं अपनी इस नौका में 
समुद्र तट पर तैरती जो अटकी है लंगर में !
सूरज की रोशनी से चमकते चारागाह के निकट 
और तकता रहूँ हरी चादर ओढ़े पहाड़ियों को विकट
इस उधेड़बुन में खोया हाकी वह अध्येता यायावर
क्या आया होगा इस अप्रतिम,अबूझ ठिकाने पर!
.....
वे हरफनमौला यायावर अक्सर यहीं डालते हैं डेरा
इसी जगह को कभी जंगलों और जानवरों ने था घेरा
यहीं उस अध्येता यायावर को मिली थी शांति की राह
आततायी विद्रूपता से विमुख होने विरक्ति की चाह 
आक्सफोर्ड के छात्र यहीं करते थे नौकायन
ग्रीष्म यामिनी में घर लौटकर करने से पहले शयन
अपनी अँगुलियों से नदी की शीतल जलधारा को सहलाते
जैसे ही लंगर से छूटकर घूमती थी उनकी नौका
पीछे झुककर झूलने लगते थे स्वप्न का झोंका
उस्न्की गोद में रहते थे ढेर सारे फूल झर झरकर 
छायादार शीतल ठौर,खेतों में लदी फसलों की सरसर 
तकते रहते चन्द्रप्रभा से आल्हादित झरनों की कलकल 
........
पर हाय!आक्सफोर्ड के छात्रो ने पार कर ली थी नदी
चप्पा-चप्पा ढूँढा,अध्येता यायावर नहीं मिला कहीं
बालाएं जो आकर करती थीं नृत्य जहाँ-जहाँ
सांझ ढले हिरनी बनी गाँव की गोरियां वहां-वहां
अठखेलियों के साथ उन्होंने भी पार कर ली थी वह बाड
शायद! देखा होगा उन्होंने कहीं उस अध्येता यायावर को
जो भर देता था उनके आंचल में ढेर सारे  फूलों को
पर कभी नहीं लाता था जुबान पर अपने मन की बातों को
..........
पुष्प-पवन पुष्प और नील घंटिका के
भोर के तुषार बिन्दुओं में भीगे-भीगे से
नीलवर्णी आर्किड,लुभावनी पत्तियों के 
कोई न जान सका ठिकाने अध्येता यायावर के
......
घूमने लगा काल चक्र और बीतता गया हर प्रहार
लू की लपटों से सहमता रहा रपटा दोपहर
सूखी घांस के गट्ठर लहराते थे लहर-लहर
और चमकने लगे रोशनी के टुकड़े दरान्तियों पर
सरसराते खेतों से जाया करते थे खेतिहर
वहीँ पर उतरते थे अबाबीलों  के स्याह पर
थककर चूर,अठखेलियाँ -कल्लोल करते थे जहाँ पर
हाय! उसी डोह में कोई नहीं आता था वहां पर
...............
अचानक ही उनका मलिन मुख मुस्काया
सोचा!कितनी  प्रतीक्षा के बाद अध्येता यायावर को पाया
उफनती नदी के तट पर बैठा था वह स्थिति प्रग्य
अजूबा सा परिधान पहने जारी था उसका भाव-यग्य 
गहरी खोई सी आँखों में थी सपनों  की छाया
दूर...से देखकर उसे, सबका मन हर्षाया
पर हाय! नियति को उनका सुख न भाया
जाकर वहां देखा तो उसे कहीं न पाया
गुम हो चुका था "अध्येता यायावर  का साया
सोच उन सबने होगी यह ईश्वर की माया
.................
नहीं! वह दिखाई दे जाता था कहीं न कहीं पर
क्यूमर पहाड़ी की वीरानी में बसे किसी फ़ार्म हाउस पर
अपनी झलक दिखा देता था वह अध्येता यायावर
किसी प्रतीक्षारत गृहिणी को खुले दरवाजे पर
कोठारो पर जो गंधाते थे काई से
निहारत था वह थ्रेशर को अपलक नेत्रों से
मिलता था उन छौनों से जो विचरते थे ढलानों  पर 
और चनसुर की तलाश में भटकते थे सोतों पर
........
सचमुच...उन्होंने ही देखा था उस अध्येता यायावर को
अपलक निहारते दूब की चादर  ओढ़े  खेतों को 
खिलाता था वह चारा अक्सर भूखी गायों को 
और प्रफुल्लित हो मुस्कान से खिला लेता ओठों को
गर्मियों में वह निकल पड़ता था वीरान जंगलों की ओर
पगडंडियों के किनारे बसे थे वहीँ यायावर तम्बू दोनों ओर
........
हां .. आता था यायावर उन अबूझ बस्तियों में
 चीथड़े और पैबंद थे जहाँ पर हर झाडी में  
मीलों पसरी भूमि के ऊपर सारे जंगल में 
कस्तूरक पक्षी      दबाकर दाना अपनी चोंच में 
विहार करते थे निडर, यायावरों की उपस्थिति में 
निर्भय थे  सभी ,ममतामयी प्रकृति की गोद में 
.....
 अक्सर सैलानी बन घूमता था वह अध्येता यायावर
सूखी टहनी घुमाते अपने हाथों पर 
उस अलौकिक क्षण के लिए प्रतीक्षा रत था चेहरा 
सर पर जब उसके सजेगा ...सफलता का सेहरा