.अपनी  बात ...

मित्रों...आंग्ल भाषी साहित्यकारों  का रचना संसार अद्भुत है. मेरी अपनी राय है कि हिंदी भाषी कविताएँ पढने के साथ साथ अंग्रेजी से अनुदित कविताओं के बिम्बों व् उपमाओं का गहन अध्ययन करे. न्यूनतम स्थिति में, अनुदित कविताएँ पढने से यूं लगेगा मानो हम किसी सेतु से गुजर कर अंग्रेजी भाषा के रचनाकारों से बजरिये काव्य,रू-ब-रू हो रहे है. यही सोच मैंने अपने नए ब्लॉग " अनुकाव्य " आपको समर्पित करते मनस्थ रखी.पहला पड़ाव है अंग्रेजी से अनुदित उन कविताओं का जिसमें उन्होंने  वनचरों की समग्र जीवन शैली को रचनाधार बनाया है. 


       1.घोंघा -(CONSIDERING THE SNAIL- BY-THOMAS GUN)
हरी  चादर  पर  रेंगता  एक  घोंघा      
भीगी खुरदरी बोझिल  सी घास पर 
एक चमकीली सी पगडण्डी बनाता
वहाँ ,जहाँ धरती के धूमिल रंग को 
और भी गहरा कर देती है बारिश 
रेंगता है वह आकांक्षाओं के बीहड़ में 
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अपने शिकार को आता देख 
भयभीत पुन्केसरों का कम्पन 
समझ नहीं पाता  मैं कि 
कौन सी शक्ति से वे हैं उद्दीप्त!
प्रयोजन -कुछ भी न समझकर 
कि कैसा है उस घोंघे का आवेश 
मैं सोचने लगता  हूँ  अगर 
मैंने नहीं देखी होती वह पगडण्डी
सफ़ेद, पतली और चमकीली 
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कभी नहीं कर पाता मैं 
धीमी पर निश्चिन्त प्रगति के लिए
 घोंघे के उस मंथर उन्माद की.
हरी चादर पर रेंगता है एक घोंघा 
  
                         2.  खरगोश         (THE HARE-BY-WILLIUM COPPER)
जिसे ग्रे हाऊँद भी छू न पाया 
ओस  भी जिसके पैरों रही अ-मृत            
दुलारा गया जिसे प्यार से 
रोटी, दूध और दूब खाता था वह 
सलाद और गाजर भी भाते थे उसे 
उसका लान था तुर्की गलीचा
जहाँ भरता था वह कुलांचे 
शाम को करता था वह शैतानी 
पुरबाई या फुहारों के समय 
आ जाता था दुबककर गोद में 
अब अखरोट की छाया तले है 
उसका बसेरा चिरनिद्रा में लीन
मानो खामोश करता है प्रतीक्षा 
मेरे पुचकारने की 

                       3.            अश्व     HORSES-  ( BY VITTER  BYNER )
शब्द हैं लौह वलय-जिसे
फलांगने का मतलब है-अर्थ
यह है अनावृत्त पीठ
सरपट दौड़ते अश्व की 

                      4.          मच्छर          (BY-DAVID HERBERT LAURENCE )
अपनी चालबाजियां  कब से शुरू कर दी 
आपने ... ओ महोदय!
किसलिए खड़े होते हो इन ऊंची टांगों पर                 
चीथड़े नुमा  पिंडलियाँ क्यों हैं इतनी लम्बी!
प्रतीक   तुम्हारे आनंदातिरेक का... ओ दम्भी!
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क्या यह इसलिए कि तुम ऊपर उठा लोगे
अपने गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बिंदु !
जैसे ही अवतरित होगे मुझपर 
बन जाओगे वायु से भी अधिक भारहीन
और शून्य की तरह खड़े हो जाओगे 
तुम-किसी भूत या पिशाच की तरह !
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पंखदार फतह-कह रही थी 
एक महिला तुम्हें ,सुना था मैंने
और तुमने मोड़ दिया अपना सर 
दुम की ओर , और मुस्कुरा दिए!
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अब तक नहीं समझ पाया मैं 
आखिर इतनी कमजोर काया में
अरे ओ पारभासी पिशाच!
कैसे भर लेते हो इतनी शैतानियत !
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अद्भुत महीन पंखों और पतले पैरों से 
कैसे उड़कर आते हो सारस की मानिंद 
जैसे हो कोई हवा का झोंका 
छद्म निर्वात का लेकर छलावा 
रहस्य कैसा पसरा है तुम्हारे इर्द-गिर्द
पातकी दबे पाँव आते हो आखेटक की तरह
मक्कारी से तुम्हारा उड़कर आना 
और मस्तिष्क को कर देना पूरी तरह सुन्न 
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धूर्तता है तुम्हारी या कोई बेहूदा जादू!
अदृश्यता और  निश्चेतना के जरिये 
अपने लिए मेरी संवेदना कर देना लुप्त 
तन्द्रा में डूबे मन को कर देना सुप्त 
पर अब मैं जान गया हूँ तुम्हारा भेद 
ओ मायावी जादूगर !मत करना खेद
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विलक्षण ! कैसे तुम शिकार को घेरकर 
और टोह लेकर हवाओं में 
छलकर ... गोल चक्करों में घूमकर 
आक्रमण कर देते हो अचानक मुझपर!
पंखों पर सवार वेताल की तरह
ओ पंखदार विजेता!!!
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पतली टांगों से होकर मुझपर सवार
मक्कारी पूर्वक देखते हो कनखियों से 
मैं जाग रहा हूँ- जान जाते हो धूर्त!
और लगा देते हो कलंक!
घृणा  होती है मुझे, तुम्हारी इस हरकत से
खाते हो कलाबाजियां एकदम से
भांप लेते हो तुम, मेरे मन की थाह
जो होती है तुम्हारी मृत्यु की राह 
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तब आओ ... उनसे खेल खेलें 
असावधान हैं जो और हम देखें 
कौन जीतता है छल-प्रपंच के खेल में 
इंसान या मच्छर -इन दोनों में!
अस्तित्व- नहीं जानते हो तुम मेरा
मैं भी नहीं जानता तुम्हारा अस्तित्व 
तब फिर- यह आवाज ...!
भिन्न भिन्न...यही है घ्रिनास्पद  भिन्न भिन्न 
*****
तुम्हीं हो नोकदार परम दुष्ट !
कानों में गूंजती है  मेरे रणभेरी तुम्हारी 
आखिर क्यों उतर आते हो इस नीचता पर!
 निश्चित ही यह कुत्सित नीति है 
और वे कहते हैं, तुम्हारी मजबूरी है!
और सचमुच यदि ऐसा है ...
तब उस विधान पर नहीं है विश्वास
कि निष्पाप का विधाता है भाग्य!
पर लगता है किसी नारे जैसा अबूझ
जैसे ही तुम भेदते हो मेरी खाल
विजयोल्लास से भरकर करते  हो चीत्कार  
  *******
रक्त ...रक्त... लाल सुर्ख रक्त !
दिव्य चमत्कारिक ,वर्जित द्रव्य
अवाक निहारता हूँ मैं तुम्हें अचेत
दुबारा बन जाते हो आक्रामक एक 
कुत्सित रूप से होते हो परमानंदित
रक्त चूसकर... मेरा अपना रक्त!
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ऐसा सन्नाटा ...! ऐसा निस्तब्ध मौन !
प्रपंच भरी  उपस्थिति में तुम्हारे सिवा  कौन
 लालच से भरा ऐसा दुष्कर्म!
अतिचार की पराकाष्ठा,इतना कुकर्म!
विचलित  कर देते हो तुम सबको 
पंखदार प्रमादी ,अभिशप्त  हो!
भारहीनता देती है तुम्हे अभय दान 
मेरा हाथों में ही छिपा होता है वरदान
पर दावानल उगलता है जब मेरा क्रोध 
आल्हाद गीत गाकर बढा देते हो मेरा रोष
तेज झोंके के साथ उड़ जाते हो तुम ! 
पंखदार पिशाच... रक्तशोशी हो तुम!
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काबू में नहीं आओगे -क्या हो अपराजेय!
या फिर तुम हो कोई योद्धा अजेय!
ओ पंखदार विजेता 
मच्छर बनकर क्या मैं नहीं मिटा सकता 
तुम्हारे भीतर का शैतानी मच्छरत्व 
या तुम ख़त्म कर दोगे मेरे जीवन का तत्व!
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अद्भुत मेरे अवशोषित रक्त ने बना दिया 
मेरे ही तन पर कितना बड़ा दाग 
यह दाग है असंख्य धब्बों के अलावा 
कितना छलना है इन दागों का छलावा
अदभुत!कितने भद्दे धब्बे छोड़कर तुम 
धुंधलके में अदृश्य ,कहीं हो गए हो गुम!

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