पैमाना दर पैमाना



          पैमाना दर पैमाना -----MEASURE FOR MEASURE-BY-SHAKESPEARE

अपने ओठों को हटा लो...परे कर लो   
जो शरारत से खाते है ,मीठी कसमें 
...हमेशा तोड़ने के लिए ,झूठे वायदे
और मूँद लो इन पलकों को भी 
जिनकी रौशनी भरमाती है भोर की  किरणों से
..पर मेरे चुम्बन लगते हैं बार-बार
बारम्बार...प्रेम की अगणित मोहरें
लेकिन वे भी तो हैं दम्भी लहरें
इसलिए,अपने ओठों को हटा लो...परे कर लो

 सीलिया के नाम एक प्रेमगीत- SONG TO CELIA- BY-BEN JONSON


 तुम्हारे    मादक  नेत्रों  की  हाला 
मुझे करती है गाफिल वह मधुशाला           
तृप्त होने दो मुझे उन मदिरा के प्यालों से
या रीते प्यालों पर धर दो चुम्बन अधरों से
होगी  अगर तुम्हारे मादक नेत्रों की हाला
सच स्पर्श भी न होगा मदिरा का प्याला
आत्मा के गर्भ में जब जागती है प्यास
व्याकुल कर देती है प्रेम की आस
तुम्हारे आत्मिक प्रेम की ज्वाला में 
होम है यह-विषमयी द्राक्ष दुहिता
गुलाबों का मैंने भेजा था गुलदस्ता
शपथ है श्वास की,गंध और गमक की
न जाने क्यों लौटा दिया तुमने !
पर उसमें  अब भी आ रही है गंध
ताजे गुलाबों की!...नहीं ,,,
तुम्हारे श्वास की... प्रेम की!!!!


              कवि का स्वप्न ---THE POET'S DREAM----BY---PB SHAILEY

कवि के ओठों पर निद्रामग्न प्रेमदक्ष
स्वप्न में डूबे अगणित यक्ष                            
श्वासों में हो रहे थे स्पष्ट प्रतिध्वनित 
उनके नश्वर,मानवी सुखों को अर्पित
पीछा करती हैं आकृतियाँ  विचारों के झंझावत में 
सांझ तक खोया है कवि जिनके चुम्बनों में 
झील पर प्रखर पावन सूर्य का प्रतिबिम्ब 
पीली मधुमक्खियों के छत्तों की मानिंद
फिर भी विचारों के बीहड़ में हैं गुम्फित
तंतुओं के तार.. शब्दों के मणि अगणित
यथार्थ रूप में प्रकट हो जाते हैं सूत्र
साकार हो जाते है सारे  मानसपुत्र

               बारहवी रात का एक अंश ---BY- SHAKESPEARE


ओ प्रियतमा ! कहाँ खो गई हो तुम?          
सुनो.. आ रही है तुम्हारे प्यार की गुन
जिसके गीतों में है मंथर और आलाप की धुन
छुपो मत वनसुंदरी!.. तुम वनांचल में निर्जन 
यात्राओ को विराम देता है प्रियजनों का मिलन
क्या नहीं जानता है हर बुद्धिवान बेटे का मन!
आज ख़ुशी है तो हंस लेते हैं हम 
प्रेम के पल होते है  कितने कम !
आगे  क्या होगा यह भी तो नहीं जानते हम!
यदि देर कर दी तो तड़पेगी मीन
आओ प्रणय आराधना में हो जाएँ लीन
यौवन सागर न रहा तो बन जायेंगे हीन

     प्रेम ----LOVE-- BY -- GEORGE HERBERT  

 प्रेम  के  स्वागत  से  ठिठक  गई  आत्मा 
अपराध बोध था -पाप,वासना का
प्रेम की गिद्ध दृष्टि ने भांप लिया तत्क्षण      
प्रथमागमन  से ही मेरा वह म्लान मन 
मोहक अदा से आकर  मेरे निकट
प्रेम ने पूछा- कोई समस्या है विकट?
****
एक आगंतुक-जवाब दिया मैंने ,
क्या योग्य है सम्मान के!
प्रेम ने प्रत्युत्तर दिया--हाँ!
पर मैं अभद्र और कृतघ्न...फिर भी!
ओह! मेरे प्रिय...नहीं देख सकता मैं 
स्नेह से थाम लिया था प्रेम ने मेरा हाथ
और मीठी मुस्कराहट से दिया जवाब-
"किसने बनाई है आँखें ,मेरे सिवाय!
 *****
शाश्वत, ध्रुवसत्य ही तो है देव!
पर मैंने  कर दिया है उन्हें दृष्टिहीन 
छि ..छि...अब मेरे भीतर की शर्म को जाने दो
वहां पर,जो है बेशर्म आँखों का नियत स्थल
*****
मैं जानता हूँ की  नहीं कर सकते हो ऐसा तुम
कहा प्रेम ने-" किसने ओढ़ लिया दोष!
प्रियवर!कौन होगा सिवाय  मेरे!
बैठ जाओ-अधिकारिक स्वर था प्रेम का 
ख़त्म कर दो तत्क्षण मेरे भीतर की ईर्ष्या 
बस!करने लगा था ईर्ष्या आत्मसात मैं!!!






























Dr. Sanjay Nawale: AGANPATH -Uttam Kamble translated by Dr. sanjay na...

Dr. Sanjay Nawale: AGANPATH -Uttam Kamble translated by Dr. sanjay na...

प्रेम गीत

1. निद्रारत सुंदरी 


मित्रों. आज से अंग्रेजी  साहित्यकारों  के प्रेम गीतों का हिंदी भावानुवाद .जैसा मुझसे बन पड़ा मैंने किया. अंग्रेजी से हिंदी, फिर उसे उसी छंद में आबद्ध करना कभी मुश्किल तो कभी नामुमकिन  होता है. लिहाजा अनुवादक की भावना  मूल लेखक की रचना से आलिंगन बद्ध होकर  अधिकार पूर्वक सहमति जताती है. कुछ नए शब्द जुड़ते हैं... कुछ पुरानी लाइनें गुम हो जाती है. यकीन मानिये रचना के दिल को ठेस न पहुंचे पूरा ख्याल रखा जाता है.मूल कवि की रचना और अनुवादक की भावना -दोनों सहेलियों की तकरार-मनुहार को कविताओ का चेहरा देने का यह मेरा अबोध प्रयास है-

  निद्रारत सुंदरी     THE SLEEPING BEAUTY  BY - SAMUEL ROGERS

स्वर्ग   के   स्वप्न  देखती  है  निद्रारत  सुंदरी 
हंसती है आँखें उसकी पलकों में छिपी
गुलाबी ओंठ मुस्काते हैं मीठी मुस्कान
और थरथराने लगते है गहरी साँसों से
रक्तिम कपोल हैं लज्जा के चुम्बन से
हंसिनी का भास सुराहीदार गर्दन से 
स्पर्श करता है प्रणय अदृश्य ओठों से 
ओठों ही ओठों में गुनगुनाती है कैसे
जानना चाहता हूँ पर डर है  जैसे 
 विस्मृत है देहभान ,देहो के मेल से
सिसकती    है  वह कसमसा कसमसाकर
संगमरमरी हाथ हैं धवल गुम्बदों पर 
हिंडोले में झूलती है अब वह निद्रारानी के
जसे कोई फरिश्ताखोया हो विश्रांति में
खोई रहो स्वप्नों में निद्रालीन इसी तरह
स्वर्ग के नियंत्रण में है भावनाओं का बहर
अदृश्य लोक में छ्पराज दिव्य स्वप्न का
मीठी मुस्कान,तुम्हारी कसमसाहट का

खूबसूरत कलियों के नाम -TO THE  VIRGINS  - BY ROBERT HARRICK 

ओ खूबसूरत गुलाब की कलियों !                          
दुपट्टे में समेट लो समय के पाखी को
आज खिलखिलाकर रहे है जो दहक
उड़ जाएगी सदा के लिए  उनकी महक
स्वर्ग का ज्योतिपुंज.. यौवन का सूरज
उठ रहा है अब धीरे-धीरे आकाश पर
आयु का दावानल जब झुलासयेगा तन
 नहीं लौटेगा तब यौवन का मादक मन
रति ताप से जब दहकने लगता है तन
प्रेम की मधुरता से महकता है मन
प्रौढ़ता का प्रतिबिम्ब जब छू लेगा तन
गमकती यादों में रोया करेगा मन
मत बनो लाजवंती,प्रेम की यही है चाह
आसक्त भमर को है मधुरस की आस
कुम्हलाया अगर यौवन पुष्प.मुरझाएंगे टेसू
जीवन भर आँखों में होंगे आंसू आंसू आंसू...


रोजलीन ---- ROSALIN-BY-THOMAS LODGE 

चमकता है आसमान में अप्सराओं सा            
दिव्य रूहों का सौन्दर्य अलौकिक सा  
केशों का मोहपाश है उसका मेघवृन्द  सा
बिखरे या नागिन सी वेणियों में गुम्फित सा 
तुम लावण्यमयी    रति रूपा हो रोजलीन 
उसकी आंख्ने जैसे बर्फ में जड़े हीरे
स्वर्ग का प्रवेशद्वार हैं उसकी गहरी पलकें
आँखों में जब दहकते हैं प्रेम के स्फुल्लिंग
हतप्रभ रह जाते हैं समूह  देवताओं के
क्या तुम सचमुच मेरी हो रोजलीन !
रक्तिम  बनाते  हैं  भोर  के  गुलाबी  चेहरे  को 
कपोलों की रंगत को अरुणिमा देती  सुर्खी को
मेनका सी मुस्कान मोहक है मंद- मंद
यौवन से महकते हैं रोजलीन के अंग-अंग
ओष्ठ युग्म जैसे जोड़ी गुलाब कलियों की
परिधि में है कैद मदनपाश सीमाओं की 
क्या तुम सचमुच मेरी हो रोजलीन!
शाही स्तम्भ हैं उसकी गर्दन सुराहीदार 
स्वयं प्रेम जिसके बंधन में है बेजार
अपनी एक झलक  पाने को आतुर प्रतिपल 
झील सी आँखों में डूबता हर पल
सच! तुम कितनी सुन्दर हो रोजलीन!
आल्हाद के केंद्रबिंदु हैं कुचाग्र  उसके
और उरोज जैसे गुम्बद स्वर्गद्वार के 
जिनके सभी वलयों पर आसक्त प्रकृति 
करती है परावर्तित सूर्य रश्मियाँ भी
सम्मोहन में जिसके मैं हो जाता हूँ लीन
क्या सचमुच तुम मेरी हो रोजलीन!
उज्जवल मोती और रक्तवर्णी माणिक
धवल संगमरमर..नीलम के नीलमणि 
उसके अंग-प्रत्यंगों के सजीव अलंकार
कामदेव की धनु प्रत्यंचा को देते हैं टंकार
रेशम का स्पर्श और मधु की मिठास
रोजलीन! तुम्हारे प्रेम की कैसी है आस!
उर्वशी.. मेनका ..रम्भा या रति की छाया
कामाग्नि का देह-दर्प तुममें ही समाया 
नयन कटाक्ष करते है ईश्वर को आहत 
कामबाण की मूर्छा से मन को है राहत 

जाओ मेरे प्यारे गुलाब!! --   GO LOVELY ROSE--- BY-EDMUND WALLER 

जाओ मेरे प्यार गुलाब 
 उससे कह देना तुम जाकर कि    
गुम हो रहे हैं पल-पल ,छिन-छिन 
क्या ...अब वह नहीं जानती कि 
जब भी मैं कहता हूँ उसे-प्यारे  गुलाब!
महकने लगती है जैसे-खुद ही हो गुलाब !
*****
जाओ मेरे प्यारे गुलाब
!उससे कह देना तुम जाकर कि 
सुमन,सुधा,सुकेशा, सुनयना है वह
सहेजा हैं यौवन जिसने ,स्याह नजरों से बचाने
रति रंग सजे अंग-अंग,इस देह के वीराने
जो तन था एक शून्य बिना प्रेम भ्रमर के
रीता था यह रति धनु,बिना काम बाण के
****
चाहे तो तुम फिर मुरझा जाना गुलाब!
तुम्हारी आँखों में ही पढ़ लेगी  ख्वाब
कि कितने कम थे प्रगाढ़ता के वे पल
कली के खिलने और मुरझाने के बीच
कितने अदभुत!महकते रहे साँसों के बीच
सावन में सारिका के सुरों से गए सींच 

चांदनी में अभिसारिका ---A THRUSH IN THE MOON LIGHT-BY-WITTER BYNER 

चाँद उतरा आसमान से और
ढांप लिया आश्चर्य  से मुझे 
उसकी निकटता और स्पर्श से 
मैं हो गया सम्मोहित ऐसे 
गूंजने लगे प्रेमगीतों के स्वर जैसे
मेघों की गरज,फिर शीतल फुहारें
मैंने झुकाया सर उस चाँद की ओट में 
बेसुध था उस स्निग्धता से मैं
और चाँद आ गया एकदम पास 
पक्षियों के कलरव ने जगाया देह्भास 
सर उठाया तो निशा ने कहा अलविदा
यामिनी के स्याह को  ले उडी  वे रश्मियाँ 








































--
Regards

Kishore Diwase
09827471743

अनुकाव्य: वनचरों पर अनुकाव्य...


9. वनराज ...
: "वनचरों पर अनुकाव्य... 9. वनराज MOUNTAIN LION BY-D.H.LAWRENCE सर्दियों और जनवरी की बरसती बर्फ में बहते पानी के ..."

वनचरों पर अनुकाव्य...    



9.         वनराज          MOUNTAIN LION  BY-D.H.LAWRENCE

सर्दियों और जनवरी की बरसती बर्फ में 
बहते पानी के गहरे दर्रे स्याह
घने सनोवर के वृक्ष,नीली गुलमेहंदी
तरल जल की कल-कल,छल-छल
और दूर तक पसरा नागरमोथे  का जाल
*****
वहाँ है इंसान... दो इंसान
इंसान-दुनिया का सबसे भयावह प्राणी!
वे झिझकते हैं बन्दूक रखकर भी
 पर, हमारे पास तो कुछ भी नहीं!
सबके कदम बढ़ते हैं आगे की ओर 
निकलते हैं दो मेक्सिकी अजनबी
घनघोर घनी घाटी से बाहर
अँधेरा... बर्फ और एकाकीपन 
गुम होती पगडंडियों पर 
क्या कर रहे हैं वे दोनों ?
*****
कांधे पर लदी पीली सी गठरी 
आखिर क्या है-हिरण!
मूर्खतापूर्ण हंसी से झेंपते हैं वे
जैसे पकड़ी गई हो कोई गलती
और हम भी मुस्कुराते है ,उसी तरह
मानो अन्जान हों उस दुखान्तिका से
क्या सभ्य है वह गहरे चेहरे का इंसान!
और बेबस है हम-वनराज!
*****
ओह  वनराज .....!
पीतवर्णी पर निर्जीव,प्राणहीन
तिरस्कार भरी हंसी से बोला वह
मारा है मैंने इसे आज सुबह
गोल, सुन्दर माथा ,निष्प्राण कर्ण
काली दमकती धारियां
सर्द चेहरा और आँखें बेजान
इंसान-अधिकारी है खुलेपन का 
और हम सिमटे घाटी के धुंधलके में 
*****
यहाँ ऊपर किसी वृक्ष की शाख पर
मिलते हैं कुछ केश गुच्छ 
भर आता है मन,आँखें होती है नम 
गहरा सूराख है नारंगी चट्टान की छाती पर
बिखरी हड्डियाँ,शाखें और फैलती गंध
अब उस राह नहीं जायेंगे कभी वे लोग
क्योंकि यहाँ नहीं गरजेगा वनराज
न होगा कुहासे सा चेहरा और...
न होगी उसकी निहार ,चमकीली धारियां
नारंगी चट्टानों  से बनी घाटी के पेड़ों से 
निकालकर अपना चेहरा मुहाने पर
नहीं होगा वह वनराज 
*****
पर मैं देखता हूं दूर..दूर..और दूर
रेगिस्तान के क्षितिज का वह धुंधलका 
एक स्वप्नमयी मृगमरीचिका
बर्फ जमी पहाड़ी पर ,हरे स्थितिप्रग्य 
क्रिसमस वृक्ष की तरह खड़ा मैं
सोचता हूँ की इस एकाकी दुनिया में 
जगह थी मेरे और वनराज के लिए भी
*****
पर... उस पार की दुनिया में 
कितनी आसानी से बसने देते हैं हम
इंसानों की अनगिनत बस्तियां अनथक
फिर भी कितना अंतर है इन दोनों दुनियाओं में 
इंसानों को हम नहीं खोते कभी पर
वनराज को क्यों खो देता है इंसान!

10. विरही परिंदा   TO THE WIDOW BIRD  BY-P.B. SHAILY 

बिछड़ी  माशूका  के  गम  में  मायूस था 
विरह से व्यथित एक विरही परिंदा
बैठा था कांपती डाल के कोने पर
गुमसुम.. यादों के हसीं हिंडोले पर
सीना  चीर रही थी ऊपर हवाएं सर्द
नीचे बहता झरना भी हो गया था बर्फ
बेरौनक थे बेपत्ता जंगलों के नंगे ठूंठ
जमीन पर भी नहीं गिरा था एक भी फूल
खामोश थी हवाएं ... एकदम बेजान
गाहे-ब-गाहे चीखती थी पवनचक्की  नादान

11.              EAGLE -  BY--A. L. TENINSON 

 
खुरदरी चट्टान को अपने क्रूर पंजों में थाम    
वीरान भूमि पर ,तप्त सूरज के आयाम
नीलाभ विश्व के वर्तुल,फिर भी नहीं आराम
झुर्रियां भरा समुद्र रेंगता  है नीचे
तीक्ष्ण दृष्टि है उसकी,शिकर के पीछे 
तब झपट्टा है वह बिजली बनकर नीचे 




 




 



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वनचरों पर कविताएँ...

 5. उलूक -        THE OWL -- by- EDWARD THOMAS 

पहाड़ियों की ऊंचाइयों से होकर      
तलहटी तक नीचे उतरा मैं
भूखा ,पर नहीं था क्षुधार्त 
शांत पर ज्वालामुखी बसा था मुझमें 
उस उत्तरी चक्रवात से जूझने 
तब एक सराय में मैंने बुझाई
 अपनी आग,भूख और थकान 
मैंने समझा कि कितना अतृप्त 
और थककर चूर हो गया था मैं
निस्तब्ध निशा का वह सन्नाटा
जिसे चीरती थी कर्कश चीख
उलूक ध्वनि-कितनी अवसाद भरी 
लम्बी चीख पहाड़ी पर गूंजती
जिसमें न था ख़ुशी का लेशमात्र पर 
उस रात जो मैंने पाया दूसरों ने नहीं
जब मैं पहुंचा था उस सराय में 
पक्षियों के कलरव से आनंदित 
नक्षत-जडित नीली चादर के नीचे
उन सिपाहियों और ग़रीबों के लिए थी
वह मीठी चहक ,जो भूखे थे 
उस आनंद और उल्लास के

    6.शिशिर में वनों के राजहंस   THE WILD SWANS AT COOLE    -BY-Y.B.KEATS

सूखी  है  वनों  की  पगडंडियाँ                        
और वृक्षों पर छाया शिशिर का सौन्दर्य
शरत की गोधूली  वेला पर 
अंकित है स्थिर नीलाभ का प्रतिबिम्ब 
पत्थरों पर छलकती जलधाराओं के बीच
विहार कर रहे हैं राजहंस
******
मुझ पर छाई उन्नीस वसंतों की गमक
धवल परिंदों के परों का कोलाहल 
अचानक हो गया मौन...स्पन्दन्हीन
मेरा मन हो गया अवसाद से पूर्ण
गोधूली वेला में मैंने पहली बार महसूसी थी
घंटियों की मानिंद,धवल पंखों की थिरकन
आहिस्ता-आहिस्ता वह प्रणय नर्तन
अनथक हंस युगलों की जलक्रीडा
तब झरनों में थी ,अब नीलाभ  की ओर
प्रणय उन्माद    वही है ..पर गंतव्य सर्वथा नया
******
शिशिर  में ,रहस्यमय मोहक शांत जल पर 
झील के किनारे या किसी पोखर में 
बसा चुके होंगे वे अपना नया बसेरा
उन्हें देख चमकती होंगी कई आँखें
पर किसी रोज जब जागूँगा मैं
दूर... उड़  चुके होंगे वे वनों के राजहंस 

            7. बाज निद्रा -- HAWK ROUSTING---BY-TED HUGH ES 

दरख्तों की ऊंचाई पर ,मुंदी आँखों से     
बैठता हूँ में शांत-स्थितिप्रग्य 
नहीं होते कोई मिथ्या स्वप्न
वक्रदृष्टि और पंजों की जकडन के बीच
नींद में भी सधता है अचूक निशाना 
मृत्युदंड -और सब कुछ ख़त्म
*******
वृक्षों की गगनचुम्बी ऊंचाइयों का सुख
प्राणवायु की उत्प्लाविता और 
सूर्य की रश्मियाँ हैं वरदान हैं मेरे लिए 
पृथ्वी का ऊर्ध्वमुख करता है चातकी  निगरानी
खुरदरी छाल पर पंजों की जकडन
मानो लग गई हो समूची सृष्टि 
मेरे पंख-दर-पंख रचने में 
और उन्हीं पंखों से जकड लिया है सृष्टि को  मैंने
*****
बांधे हैं मृत्युदंड  के सारे आदेश
वृहत  वर्तुलो के अपने यमपाशों से 
जब जिस पर चाहूँ देता हूँ फेंक 
सब कुछ मेरा होने का दंभ
लबादा नहीं ओढा है संस्कारों का 
मेरे झपटते से ही उड़ते हैं खोपड़ियों के परखचे 

8.              मार्जर विलाप      MORT AUX CAT-    BY-PETER पोर्टर

अब नहीं होंगी कहीं बिल्लियाँ               
फैलाती हैं वे संक्रमण और प्रदूष्ण 
अपने वजन से सात गुना अधिक 
हजम कर जाती हैं ये बिल्लियाँ
पतनोन्मुख समाजों में थी वे पूजित
बैठकर करती हैं वे मूत्र विसर्जन 
जुगुप्स है उनकी प्रणय आराधना
******
चंद्रमा पर होती हैं वे आसक्त
मार्जर जगत में हो वे सह्य
पर विलोम हैं हमारे उनके रिवाज 
वे सूंघती हैं ,आदत से हैं लाचार
बिल्लियाँ देखती है टेलीविजन
और तूफानों में भी हो जाती है निद्रालीन
नोंच लेती है अचानक वे दबे पाँव 
*****
वे लोग नहीं बन सकते बड़े कलाकार
जिनकी आदतें होती है बिल्लियों की तरह
सिरदर्द, मरते पौधे की दोषी हैं वे 
बढ़ रही है बिल्लियाँ हमारे इलाके में 
और गिरते जा रहे हैं नैतिकता के मूल्य
अनगिनत बिल्लियों का रक्तपात
देखता हूँ जब आते हैं दिवा स्वप्न
आखिर क्यों करती है वे गूढ़ प्रलाप
पर बिल्लियों का रक्तपात!  श्वानों की सता 
हजारों वर्षो तक रहेंगे शाश्वत!

.अपनी  बात ...

मित्रों...आंग्ल भाषी साहित्यकारों  का रचना संसार अद्भुत है. मेरी अपनी राय है कि हिंदी भाषी कविताएँ पढने के साथ साथ अंग्रेजी से अनुदित कविताओं के बिम्बों व् उपमाओं का गहन अध्ययन करे. न्यूनतम स्थिति में, अनुदित कविताएँ पढने से यूं लगेगा मानो हम किसी सेतु से गुजर कर अंग्रेजी भाषा के रचनाकारों से बजरिये काव्य,रू-ब-रू हो रहे है. यही सोच मैंने अपने नए ब्लॉग " अनुकाव्य " आपको समर्पित करते मनस्थ रखी.पहला पड़ाव है अंग्रेजी से अनुदित उन कविताओं का जिसमें उन्होंने  वनचरों की समग्र जीवन शैली को रचनाधार बनाया है. 


       1.घोंघा -(CONSIDERING THE SNAIL- BY-THOMAS GUN)
हरी  चादर  पर  रेंगता  एक  घोंघा      
भीगी खुरदरी बोझिल  सी घास पर 
एक चमकीली सी पगडण्डी बनाता
वहाँ ,जहाँ धरती के धूमिल रंग को 
और भी गहरा कर देती है बारिश 
रेंगता है वह आकांक्षाओं के बीहड़ में 
******
अपने शिकार को आता देख 
भयभीत पुन्केसरों का कम्पन 
समझ नहीं पाता  मैं कि 
कौन सी शक्ति से वे हैं उद्दीप्त!
प्रयोजन -कुछ भी न समझकर 
कि कैसा है उस घोंघे का आवेश 
मैं सोचने लगता  हूँ  अगर 
मैंने नहीं देखी होती वह पगडण्डी
सफ़ेद, पतली और चमकीली 
******
कभी नहीं कर पाता मैं 
धीमी पर निश्चिन्त प्रगति के लिए
 घोंघे के उस मंथर उन्माद की.
हरी चादर पर रेंगता है एक घोंघा 
  
                         2.  खरगोश         (THE HARE-BY-WILLIUM COPPER)
जिसे ग्रे हाऊँद भी छू न पाया 
ओस  भी जिसके पैरों रही अ-मृत            
दुलारा गया जिसे प्यार से 
रोटी, दूध और दूब खाता था वह 
सलाद और गाजर भी भाते थे उसे 
उसका लान था तुर्की गलीचा
जहाँ भरता था वह कुलांचे 
शाम को करता था वह शैतानी 
पुरबाई या फुहारों के समय 
आ जाता था दुबककर गोद में 
अब अखरोट की छाया तले है 
उसका बसेरा चिरनिद्रा में लीन
मानो खामोश करता है प्रतीक्षा 
मेरे पुचकारने की 

                       3.            अश्व     HORSES-  ( BY VITTER  BYNER )
शब्द हैं लौह वलय-जिसे
फलांगने का मतलब है-अर्थ
यह है अनावृत्त पीठ
सरपट दौड़ते अश्व की 

                      4.          मच्छर          (BY-DAVID HERBERT LAURENCE )
अपनी चालबाजियां  कब से शुरू कर दी 
आपने ... ओ महोदय!
किसलिए खड़े होते हो इन ऊंची टांगों पर                 
चीथड़े नुमा  पिंडलियाँ क्यों हैं इतनी लम्बी!
प्रतीक   तुम्हारे आनंदातिरेक का... ओ दम्भी!
          ********
क्या यह इसलिए कि तुम ऊपर उठा लोगे
अपने गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बिंदु !
जैसे ही अवतरित होगे मुझपर 
बन जाओगे वायु से भी अधिक भारहीन
और शून्य की तरह खड़े हो जाओगे 
तुम-किसी भूत या पिशाच की तरह !
              ******
पंखदार फतह-कह रही थी 
एक महिला तुम्हें ,सुना था मैंने
और तुमने मोड़ दिया अपना सर 
दुम की ओर , और मुस्कुरा दिए!
 *******
अब तक नहीं समझ पाया मैं 
आखिर इतनी कमजोर काया में
अरे ओ पारभासी पिशाच!
कैसे भर लेते हो इतनी शैतानियत !
                ****
अद्भुत महीन पंखों और पतले पैरों से 
कैसे उड़कर आते हो सारस की मानिंद 
जैसे हो कोई हवा का झोंका 
छद्म निर्वात का लेकर छलावा 
रहस्य कैसा पसरा है तुम्हारे इर्द-गिर्द
पातकी दबे पाँव आते हो आखेटक की तरह
मक्कारी से तुम्हारा उड़कर आना 
और मस्तिष्क को कर देना पूरी तरह सुन्न 
   ****
धूर्तता है तुम्हारी या कोई बेहूदा जादू!
अदृश्यता और  निश्चेतना के जरिये 
अपने लिए मेरी संवेदना कर देना लुप्त 
तन्द्रा में डूबे मन को कर देना सुप्त 
पर अब मैं जान गया हूँ तुम्हारा भेद 
ओ मायावी जादूगर !मत करना खेद
  ******
विलक्षण ! कैसे तुम शिकार को घेरकर 
और टोह लेकर हवाओं में 
छलकर ... गोल चक्करों में घूमकर 
आक्रमण कर देते हो अचानक मुझपर!
पंखों पर सवार वेताल की तरह
ओ पंखदार विजेता!!!
 ******
पतली टांगों से होकर मुझपर सवार
मक्कारी पूर्वक देखते हो कनखियों से 
मैं जाग रहा हूँ- जान जाते हो धूर्त!
और लगा देते हो कलंक!
घृणा  होती है मुझे, तुम्हारी इस हरकत से
खाते हो कलाबाजियां एकदम से
भांप लेते हो तुम, मेरे मन की थाह
जो होती है तुम्हारी मृत्यु की राह 
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तब आओ ... उनसे खेल खेलें 
असावधान हैं जो और हम देखें 
कौन जीतता है छल-प्रपंच के खेल में 
इंसान या मच्छर -इन दोनों में!
अस्तित्व- नहीं जानते हो तुम मेरा
मैं भी नहीं जानता तुम्हारा अस्तित्व 
तब फिर- यह आवाज ...!
भिन्न भिन्न...यही है घ्रिनास्पद  भिन्न भिन्न 
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तुम्हीं हो नोकदार परम दुष्ट !
कानों में गूंजती है  मेरे रणभेरी तुम्हारी 
आखिर क्यों उतर आते हो इस नीचता पर!
 निश्चित ही यह कुत्सित नीति है 
और वे कहते हैं, तुम्हारी मजबूरी है!
और सचमुच यदि ऐसा है ...
तब उस विधान पर नहीं है विश्वास
कि निष्पाप का विधाता है भाग्य!
पर लगता है किसी नारे जैसा अबूझ
जैसे ही तुम भेदते हो मेरी खाल
विजयोल्लास से भरकर करते  हो चीत्कार  
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रक्त ...रक्त... लाल सुर्ख रक्त !
दिव्य चमत्कारिक ,वर्जित द्रव्य
अवाक निहारता हूँ मैं तुम्हें अचेत
दुबारा बन जाते हो आक्रामक एक 
कुत्सित रूप से होते हो परमानंदित
रक्त चूसकर... मेरा अपना रक्त!
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ऐसा सन्नाटा ...! ऐसा निस्तब्ध मौन !
प्रपंच भरी  उपस्थिति में तुम्हारे सिवा  कौन
 लालच से भरा ऐसा दुष्कर्म!
अतिचार की पराकाष्ठा,इतना कुकर्म!
विचलित  कर देते हो तुम सबको 
पंखदार प्रमादी ,अभिशप्त  हो!
भारहीनता देती है तुम्हे अभय दान 
मेरा हाथों में ही छिपा होता है वरदान
पर दावानल उगलता है जब मेरा क्रोध 
आल्हाद गीत गाकर बढा देते हो मेरा रोष
तेज झोंके के साथ उड़ जाते हो तुम ! 
पंखदार पिशाच... रक्तशोशी हो तुम!
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काबू में नहीं आओगे -क्या हो अपराजेय!
या फिर तुम हो कोई योद्धा अजेय!
ओ पंखदार विजेता 
मच्छर बनकर क्या मैं नहीं मिटा सकता 
तुम्हारे भीतर का शैतानी मच्छरत्व 
या तुम ख़त्म कर दोगे मेरे जीवन का तत्व!
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अद्भुत मेरे अवशोषित रक्त ने बना दिया 
मेरे ही तन पर कितना बड़ा दाग 
यह दाग है असंख्य धब्बों के अलावा 
कितना छलना है इन दागों का छलावा
अदभुत!कितने भद्दे धब्बे छोड़कर तुम 
धुंधलके में अदृश्य ,कहीं हो गए हो गुम!