खास तौर पर डाक्टरों ( gynaecologists)  के लिए है यह कविता ...बताइयेगा कैसी लगी 

अजन्मे की प्रार्थना   PRAYER BEFORE DEATH
BY-Louis Macnice
अनुवाद -किशोर दिवसे 

अजन्मा हूँ मैं....सुनो मेरा क्रंदन
नहीं...नहीं... मत आने दो मेरे निकट 
 रक्तपिपासू चमगीदड़ , चूहा या नेवला
या फिर कोई शवभोजी पिशाच
........
अजन्मा हूँ मैं... सहानुभूति की आस
पर मन में है स्वार्थी मानव की दहशत
वह चुन देगा मुझे ऊंची दीवारों के बीच 
और कर देगा मुझे नशीली दवाओं से सुन्न
छलेगा अकाट्य तर्कों के मायावी प्रलोभन से
यातना देगा मशीनी  दंडचक्र  से प्राणान्तक
रक्तरंजित स्थिति में करेगा उलट-पलट
क्योंकि अभी अजन्मा  हूँ मैं...
.......
अजन्मा हूँ मैं...मुझे लाकर दो
पानी... अपनी गोद में उछालने दो
नर्म दूब सहलाने दो,वृक्षों से बोलने दो
नीलाभ से मधुर गीत गाने दो
ढेर सारे परिंदे और रौशनी लाकर दो 
मेरे मस्तिष्क की कोंपल को राह दिखाने दो
.......
अजन्मा हूँ मैं...क्षमा कर दो मुझे 
उन गुनाहों के लिए जो हैं मेरा प्रारब्ध
दुनिया में अरसे से जारी परम्परा की मानिंद
सचमुच... क्षमा कर दो मुझे
मेरे शब्दों के लिए जो मैं कहूँगा
मेरे विचारों के लिए जो मुझमें कौन्धेंगे
मेरे विद्रोह के लिए जो मुझमें उपजेगा
 मेरे विश्वासघातियों द्वारा किये गए शोषण से
मेरे जीवन के लिए जब वे मुझे सुलादेंगे 
मौत की नींद...मेरे ही हाथों का फंदा बनाकर 
मेरी मौत के लिए जब वे जियेंगे
.......
अजन्मा  हूँ में.... बार-बार दुहराओ
वे बातें.. जिन जगहों पर खेलता हूँ मैं
जब बुजुर्गों की सीख करनी होती है आत्मसात
और जब अफसरशाह गुर्राते हैं मुझपर 
.........
पर्वत करतें हैं अट्टहास,प्रेमी हँसते हैं मुझपर 
श्वेत तरंगें उडाने लगती हैं निर्मम उपहास 
विनाश का आव्हान करते हैं अबूझ रेगिस्तान
भिखारी भी नकारने लगते हैं "मेरा" दान 
मेरे बच्चे तक देते हैं मुझे अभिशाप
क्योंकि अभी अजन्मा हूँ मैं
.....
अजन्मा हूँ मैं... सुनो मेरी आवाज
मत आने दो उसे कभी मेरे पास
जो है दरिंदा, छीन लेगा मेरी सांस
और तब बन जायेगा स्वयम्भू-भगवान
......
अजन्मा हूँ मैं....
मुझमें शक्ति भर दो उन लोगों के खिलाफ
जो बर्फ कर देते हैं मेरे भीतर की मानवता को 
जो शस्त्रों के जरिये बना देंगे मुझे जानलेवा मशीन
और जो तब्दील कर देंगे मुझे दंतचक्र में 
धार होगी जिसकी,उन सब के खिलाफ
छितराना चाहते हैं जो मेरी समग्रता को
झिंझोड़ कर  रख देंगे वे लोग मुझे
इधर से उधर और उधर से इधर
कंटीली भस्कतैया   की झाडी की तरह 
भरी अंजुली से जैसे छलकाए सारा जल 
.......
खबरदार...मत करने दो उन्हें मेरे खंड -खंड 
और मत बनाने दो बेजान स पाषाणखंड 
नहीं. मत छलकने दो अंजुली से बाहर 
या फिर,मार ही डालो ना मुझे ....!


















 


Kishore Diwase
09827471743

0 comments:

Post a Comment