गुनगुनाती है कुदरत 
भोर का गीत -(DAWN SONG -BY-SIR WILLIAM DAvENANT)

विदा हो रहा है चंडूल  अपने घोंसले से
झटकता है ओस ,अपने भीगे पंखों से
यह खिड़की है उसकी दिशा पूरब
भोर की किरणें देखकर गाता है गीत
         ..............
जागो जागो उठेगी नहीं अलसाई भोर
देखो..देखो दृष्टि रथ दौड़ो चहूँ और
जब तक नहीं देखेंगी ,तुम्हारी प्रेमिल आँखें
सुंदर सुशोभित उसके परिधानों की ओर
               .........
सितारों को तकता  है संदेही ,,समुद्री नाविक
और सूरज से  तय करता है दिशाएं किसान
फिर भी...प्रेमी की आँखें पूछती हैं सवाल
कौन हैं वे लोग जिन्हें है भोर की आस
           .........
इससे पहले की पूरी हो इस नींद की प्यास 
जागो... जागो...कहते हैं वे एक सांस
आओ ...आओ...अपने लिहाफों से बहार की ओर
खींच लो खिडकियों के परदे... हो गई है भोर 
          
बासंती  बौर -(TO BLOSSOM -by- ROBERT HARRICK)

फलदार वृक्षों के  ओ स्नेह्बंधन से!
क्यों अलहदा हो जाते हो नाभिनाल शाखों से!
इतनी जल्दी ! अभी नहीं आई विदाई की वेला
देखो! चारों तरफ लगा है हरा-भरा मेला
ओ मंजरी...कुछ देर और ठहर सकती हो तुम
लजाने के मोह में ,अपने में क्यों हो गुम!फिर आएगा जब पतझड़ उदास
प्यारी मंजरी!तुम नहीं होगी मेरे पास
क्या वृक्षों से किया था इतने ही साथ  का वायदा
और फिर विदाई का विरह-जब हो रात का साया
सच! व्यथित प्रकृति का यह कैसा है दुःख
बस! एक झलक के ही तुम्हारे साहचर्य का सुख!
पर, तुम प्रकृति की प्रेमिल पातियाँ हो 
पढ़ सकते हैं जिनपर अंकित सन्देश शाश्वत
" निस्सार शीघ्र हो जाती हैं वस्तुएं सार"
और बगरयो  बसंत का  बहर  हो जाता है वीरान
बौर भी अपनी मादकता बिखेरकर 
कुछ पलों के लिए तुम्हारी ही तरह 
हो जाते हैं अंत में अस्तित्वहीन,
पतझड़ में जैसे पत्ते-शाख विहीन 


नर्गिस के नाम --(-DAFFODILS- By-ANONYMOUS) 

प्यारी  नर्गिस ,
तुम्हें मुरझाते  देखकर मन है हारा
बहने लगती है निरंतर  अश्रुओं की धारा
क्योकि भोर के सूरज ने अब तक नहीं पाया 
दहकती दुपहरी के मदमाते यौवन का साया
ठहरो ... ठहरो....
जल्दबाज दिन जब तक डूब नहीं जाता
और संध्या संगीत का सुर कानों  तक नहीं आता
ठहरो....एक साथ अटूट कसमें खाकर
मैं भी चल पडूंगा तुम्हारी राह पर
मेरे पास भी बहुत कम हैं मोती समय के
जैसे  उड़ते क्षण हों मदमाते वसंत के
बीत जायेगा यह  मदनोत्सव -ऋतुराज
नवांकुरों को जैसे हो मृत्यु का डर आज
प्यारी नर्गिस,डर लगता है कि  तुम
या प्रकृति का करिश्मा हो जाता है गुम
मर जाते हैं हम ,या मुरझा जाती हो तुम
ओस की बूँदें देखकर आँखें होती हैं नम
तपती गर्मियों में पावस की बूँदें जैसे
भोर की ओस के मोती,गुम हो जाते हैं जैसे!


डोवर का समुद्र तट-        ( DOVER BEACH- By-  MATHEW    ARNOLD)


शांत है समुद्र तट आज की रात 
लहरों का यौवन,पूनम का चाँद 
सागर की जलराशि पर फ्रांसीसी तट की किरणें
गुम हो जाती है झिलमिलाकर खामोश खाड़ी में 
चट्टानें विशाल हैं धुंधलके में खड़ी
पसरा है सन्नाटा ... वीरानी है बड़ी
आओ... खिड़की के पास,मधुर है पुरवाई 
साहिल पर धरती ,चांदनी में नहाई
सुनो! नदी तट पर फैली बजरी का कोलाहल
ऊंची लहरों के साथ जो मचाता है हलचल 
और लौटते ही छा जाती है समुद्र तट पर 
बनती -मिटती लहरें...बजरी का कोलाहल
कम्पित लहरों में छिपा है सुरों का संगीत
जिनमें कहीं  होता है निराशा का भी गीत
अरसा पहले " सेफोक्लीज" ने भी सुना था
समुद्र तट पर लहरों का यही गीत
जिसकी दूँ से हो गया था उसका मन गाफिल
मानवी संताप का वह मालीन्य  पंकिल
लहरों के इसी संगीत में ढूँढा है एक विचार 
बैठकर दूर....उत्तरी समुद्र तट के पार....
विशवास का असीम सागर था कभी लहराता 
कभी इस धरा के चहूँ ओर लबालब 
जैसे अपना कमरबंद हो कोई फहराता 
उदास समुद्र की गंभीर उसांसों में डूबता
विश्व के सागर में ठंडी बजरी सा जीवन
सर्द ज्ल्समीर की साँसों से टूटता है ये मन
क्यों न एक दूजे के लिए -ओ  प्रिये!
हम सच में डूबी साँसों को ही जियें
लगता है छलती है हमें सारी दुनिया
स्वप्न लोक की मानिंद ,क्षितिज की खुशियाँ
और रूपवती सुंदरी मायावी मृग- तृष्णा
ख़ुशी... प्रेम..रौशनी और विश्वास की धारणा
शांति और त्रासदी से मुक्ति का मसीहा
सचमुच... ऐसा यहाँ पर कुछ भी नहीं
संघर्ष...दिवास्वप्न  के उहापोह भरे संकेतों से
यहीं होता है रात्रि में गूढ़ सेनाओं का संघर्ष 









 






 









               

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