गुनगुनाती है कुदरत 
अपनी-अपनी हाला  -(DRINKING -BY-ABRAHAM KAULI)



कैसी है बरखा की हाला 
निढाल है धरती,... प्यारी बूंदों की माला
वर्षा जल से उन्मत्त धरा है बेसुध सी 
सिंचित वृक्षों की छाती हो जाती है प्यासी
वृक्ष भी पीकर धरती का अवशोषित जल
हो जाता है तरोताजा ,उन्मत्त और निर्मल  
समुद्र भी...
( कोई सोचेगा उसे होगी बहुत कम प्यास की आस)
हजारों नदियों से दूना समेटे अपने गर्भ में 
ला देता  है जलजला -प्रलय पल भर में 
प्रखर सूर्य...
(तप्त चेहरे से ही जिसके प्रतिबिंबित है दावानल)
सोख लेता है समंदर ,फिर भी ऊष्मा भयंकर
साँझ होते ही लीलते है चाँद-सितारे सूरज को
रौशनी की हाला पीकर साडी रात झिलमिलाने को
सबकी है अपनी-अपनी हाला 
प्यारी सी बूँदें है-धरती की हाला
नदियों का जल है-सागर की हाला
अथाह सागर है-सूरज की हाला
और रौशनी है-चाँद-सितारों की हाला
देखो ना! जब सूरज, चाँद और सितारे
समुद्र ,धरती और लहराते पेड़ सरे
जब पीते है अपनी-अपनी हाला आकंठ
फिर क्यों न बन जाऊं मैं भी नील कंठ!
सबकी अपनी-अपनी हाला,मुझसे कहा मुंह मोड़ लो
जवाब दो नैतिकता के पुतले ... तुम्हीं अब जवाब दो 
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चिनार के पेड़   -( POPLARS- By - WITTER BYNNER  )

पहाड़  के सामने  चिनार के पेड़
अक्सर मुझे ऐसे लगते हैं मानो
किसी शहर की नन्ही खिड़कियाँ
और सूर्य जैसे समुद्र की लहरियां
मृत मानव ही याद रखता है शायद
जीवन के ये शाश्वत संकेत
लहरें जो अक्सर हो जाती हैं खंडित
और आकांक्षाओं की खिड़कियाँ भी
अगले वर्ष फिर कोई आकर
खड़ा होगा जहाँ पर मैं हूँ अभी
देखेगा मुझे पुनर दीप्त होते हुए
प्राचीन समुद्र और धरती  से
किसी समुद्र के वे शाश्वत संकेत
संकेत... किसी शहर के...
जब तक सूर्य है किसी पहाड़ के पीछे
और वायु का अस्तित्व   धरती पर 
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सुनहरी नर्गिस    -(DAFFODILS-By-WILLIAM WORDSWORTH )

भटक रहा था मैं ऊंचे आसमान पर
अकेला-उस बादल की तरह ,जो
तैरते हैं घाटियों और पहाड़ियों पर
फूलों की क्यारी.. सुनहरी नर्गिस प्यारी
झील की ओट में और तले वृक्षों के
 इतराते -बलखाते   झोंके पुरबाई के
पुरबाई के झोंकों से झूलती नर्गिस
आकाशगंगा की राह,सितारों की झिलमिल
पसरी थी नर्गिस दूर-दूर तक
खाड़ी में बहते जल के किनारे 
सुनहरी नर्गिस के दस हजार फूल
मंद पवन के झोंकों से झूल झूल झूल 
नर्गिस के निकट लहरों का नर्तन
उल्लसित फूलों का डिगा न सका तन
इसे देख हुआ प्रमुदित कवी का मन
अपलक निहारता ,भावना सम्मोहन
प्रकृति को नमन,दृश्य था नंदन
सुनहरी नर्गिस कैसी थी मनभावन 



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