पैमाना दर पैमाना -----MEASURE FOR MEASURE-BY-SHAKESPEARE
अपने ओठों को हटा लो...परे कर लो
जो शरारत से खाते है ,मीठी कसमें
...हमेशा तोड़ने के लिए ,झूठे वायदे
और मूँद लो इन पलकों को भी
जिनकी रौशनी भरमाती है भोर की किरणों से
..पर मेरे चुम्बन लगते हैं बार-बार
बारम्बार...प्रेम की अगणित मोहरें
लेकिन वे भी तो हैं दम्भी लहरें
इसलिए,अपने ओठों को हटा लो...परे कर लो
सीलिया के नाम एक प्रेमगीत- SONG TO CELIA- BY-BEN JONSON
तुम्हारे मादक नेत्रों की हाला
मुझे करती है गाफिल वह मधुशाला
तृप्त होने दो मुझे उन मदिरा के प्यालों से
या रीते प्यालों पर धर दो चुम्बन अधरों से
होगी अगर तुम्हारे मादक नेत्रों की हाला
सच स्पर्श भी न होगा मदिरा का प्याला
आत्मा के गर्भ में जब जागती है प्यास
व्याकुल कर देती है प्रेम की आस
तुम्हारे आत्मिक प्रेम की ज्वाला में
होम है यह-विषमयी द्राक्ष दुहिता
गुलाबों का मैंने भेजा था गुलदस्ता
शपथ है श्वास की,गंध और गमक की
न जाने क्यों लौटा दिया तुमने !
पर उसमें अब भी आ रही है गंध
ताजे गुलाबों की!...नहीं ,,,
तुम्हारे श्वास की... प्रेम की!!!!
कवि का स्वप्न ---THE POET'S DREAM----BY---PB SHAILEY
कवि के ओठों पर निद्रामग्न प्रेमदक्ष
स्वप्न में डूबे अगणित यक्ष
श्वासों में हो रहे थे स्पष्ट प्रतिध्वनित
उनके नश्वर,मानवी सुखों को अर्पित
पीछा करती हैं आकृतियाँ विचारों के झंझावत में
सांझ तक खोया है कवि जिनके चुम्बनों में
झील पर प्रखर पावन सूर्य का प्रतिबिम्ब
पीली मधुमक्खियों के छत्तों की मानिंद
फिर भी विचारों के बीहड़ में हैं गुम्फित
तंतुओं के तार.. शब्दों के मणि अगणित
यथार्थ रूप में प्रकट हो जाते हैं सूत्र
साकार हो जाते है सारे मानसपुत्र
बारहवी रात का एक अंश ---BY- SHAKESPEARE
ओ प्रियतमा ! कहाँ खो गई हो तुम?
सुनो.. आ रही है तुम्हारे प्यार की गुन
जिसके गीतों में है मंथर और आलाप की धुन
छुपो मत वनसुंदरी!.. तुम वनांचल में निर्जन
यात्राओ को विराम देता है प्रियजनों का मिलन
क्या नहीं जानता है हर बुद्धिवान बेटे का मन!
आज ख़ुशी है तो हंस लेते हैं हम
प्रेम के पल होते है कितने कम !
आगे क्या होगा यह भी तो नहीं जानते हम!
यदि देर कर दी तो तड़पेगी मीन
आओ प्रणय आराधना में हो जाएँ लीन
यौवन सागर न रहा तो बन जायेंगे हीन
प्रेम ----LOVE-- BY -- GEORGE HERBERT
प्रेम के स्वागत से ठिठक गई आत्मा
अपराध बोध था -पाप,वासना का
प्रेम की गिद्ध दृष्टि ने भांप लिया तत्क्षण
प्रथमागमन से ही मेरा वह म्लान मन
मोहक अदा से आकर मेरे निकट
प्रेम ने पूछा- कोई समस्या है विकट?
****
एक आगंतुक-जवाब दिया मैंने ,
क्या योग्य है सम्मान के!
प्रेम ने प्रत्युत्तर दिया--हाँ!
पर मैं अभद्र और कृतघ्न...फिर भी!
ओह! मेरे प्रिय...नहीं देख सकता मैं
स्नेह से थाम लिया था प्रेम ने मेरा हाथ
और मीठी मुस्कराहट से दिया जवाब-
"किसने बनाई है आँखें ,मेरे सिवाय!
*****
शाश्वत, ध्रुवसत्य ही तो है देव!
पर मैंने कर दिया है उन्हें दृष्टिहीन
छि ..छि...अब मेरे भीतर की शर्म को जाने दो
वहां पर,जो है बेशर्म आँखों का नियत स्थल
*****
मैं जानता हूँ की नहीं कर सकते हो ऐसा तुम
कहा प्रेम ने-" किसने ओढ़ लिया दोष!
प्रियवर!कौन होगा सिवाय मेरे!
बैठ जाओ-अधिकारिक स्वर था प्रेम का
ख़त्म कर दो तत्क्षण मेरे भीतर की ईर्ष्या
बस!करने लगा था ईर्ष्या आत्मसात मैं!!!





3 comments:
मैं जानता हूँ की नहीं कर सकते हो ऐसा तुम
कहा प्रेम ने-" किसने ओढ़ लिया दोष!
प्रियवर!कौन होगा सिवाय मेरे!
बैठ जाओ-अधिकारिक स्वर था प्रेम का
ख़त्म कर दो तत्क्षण मेरे भीतर की ईर्ष्या
बस!करने लगा था ईर्ष्या आत्मसात मैं!!!
अच्छी लगी रचना...
veena ji thnx a lot
गज़ब लिखते हैं आप ......
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